हमारा देश भारतवर्ष अनगिनत संस्कृति व सभ्यता का देश है। आज हमारे देश में इतनी जाति व
सम्प्रदाय के लोग हैं वह सभी मान्यताओं व अपनी परम्पराओं, प्राकृतिक सम्पदाओं, मानवीय मूल्यों,
उस प्रदेश में होने वाली उपज, उन प्रदेशों में हुए सन्त-महात्माओं व ऐसे महान् व्यक्तित्व वाले महापुरुष
जिन्हें हमने देवी-देवताओं या भगवान का अवतार मान लिया है, उन वृक्षों को जो हमारे स्वास्थ्य के लिए
हितकर हैं व जिनसे हमें रात-दिन प्राणवायु मिलती है उन वृक्षों की पूजाकर एक त्यौहार का नाम देते
हैं वह वृक्ष हैं पीपल-बरगद-आ¡वला-तुलसी आदि। पौराणिक कथाओं के आधार पर भी कुछ यादगार
स्वरूप व्रत व त्यौहार मनाते हैं। व्रत व उपवास हमारे मन व शरीर को स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सम्बल
प्रदान करते हैं। मन में एक शांति का अनुभव देते हैं।
व्रत का अर्थ है दृढ़ संकल्प, नियम, वैसे हम व्रत का अर्थ सिर्फ उपवास करने से ही निकालते हैं।
उपवास या व्रत से मनुष्य में अपार शक्ति का संचार तो होता ही है वहीं स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उत्तम
क्रिया है। व्रत हम जन्माष्टमी, शिवरात्री, पूर्णिमा, एकादशी आदि तिथियों पर तो करते ही हैं साथ ही पति,
बच्चों, भाइयों की चिर आयु के लिए भी करते हैं। हमारे हिन्दी नववर्ष के प्रारम्भ होने व नवरात्र में आदि
शक्ति भवानी, दुर्गा के नौ रूपों की पूजा कर व्रत रखते हैं। महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी तो बंगाल में
महाकाली, सौराष्ट्र में माँ की पूजा व आराधना में गरबा व डाडिया नृत्य का जोर रहता है, जो कि बड़ी
धूम-धाम से मनाते हैं। दक्षिण में रोली कुमकुम वहीं राजस्थान में गौरी की 15 दिन तक कन्यायें पूजा
करती हैं व उस त्यौहार को गणगौर का नाम दिया है वैसे तो तीज, करवाचौथ के शुभ अवसर पर भी
माँ गौरी की पूजा व अर्चना की जाती है। आप सभी को माँ सीता का विवाह से पूर्व गौरी पूजा का सन्दर्भ
पता ही है।
त्यौहार शब्द से ही मन में अनेक नयी जिज्ञासायें, नयी उमंग उसको मनाने के लिए जाग उठती हैं।
होली का त्यौहार आया नहीं कि मन अबीर-गुलाल व रंगों में रंग जाता है। खासकर बच्चों में नये वस्त्रों
को पहनने व भाँति-भाँति के बने पकवान व मिठाई खाने-खिलाने का बड़ा उत्साह रहता है। हमारा देश
कृषि प्रधान देश है। नया अन्न गेहू¡, चना, सरसों की फसल तैयार होती है। नवीन अन्न का अग्नि में भोग
लगाकर (होलिका दहन पर) वह अन्न के दाने एक-दूसरे को देकर गले मिलते हैं। यह एक तरीका
बैर-भाव को भुलाकर आपसी प्रेम को गले लगाने का है। त्यौहार आपसी मतभेद को भुलाने का कार्य
करते हैं। ऐसी है हमारे देश की संस्कृति जिस पर हमें गर्व है।
हमारे पूर्वजों ने आपसी सम्बन्धों व नेह-नातों को निबाहने के लिये भी अनेक त्यौहारों पर अपने बड़ों
को व रिश्तेदारों को `बायना´ देने, कुछ बड़ों से भी हंसी-मजाक करते हुए उपहार देने को भी त्यौहारों
में सिम्मलित किया है। संक्रांति ऐसा ही पर्व व त्यौहार है। इन त्यौहारों के माध्यम से ही हमें कुछ
दान-पुण्य करने की याद आ जाती है। यही नहीं बड़े भी अनेक त्यौहारों पर अपनी बहू-बेटियों को
उपहार देकर बड़े सुख का अनुभव करते हैं। तीज का त्यौहार झूले की तरह पैंग मारने लगता है कि
हमको सिंधारा मिलेगा। यह एक सुखद अनुभव है।
ऋषि पंचमी, भाई दूज, रक्षाबन्धन का त्यौहार दूर बैठे भाइयों की याद को जाग्रत कर देता है।रक्षाबन्धन का अर्थ ही रक्षा करने के लिए बांधा गया यह डोरा है। कर्मवती (मेवाड़ की महारानी) को जब
कोई रास्ता अपनी रक्षा का नहीं सूझा तो उसने हुमायू को राखी भेजी व उसने उस राखी की लाज रक्खी।
विचारो एक राखी के धागे को बन्धवाने से भाई कितने बड़े बन्धन में बांध जाता है। पर आज का समय
दिखावे-प्रदर्शन का रह गया है।
अरे हाँ, हमारे यहा¡ सर्पों, गाय, बैल आदि की पूजा का भी विधान है। जैसे नागपंचमी का त्यौहार व
गोपाष्टमी आदि।
दशहरे का त्यौहार जहाँ बुराई पर अच्छाई का अहसास दिलाता है वहीं ज्योतिपर्व दीपावली हमारे
जीवन में उल्लास, प्रकाश, खुशियों का संचार करता है। कितनी उमंग होती है दीपोत्सव पर पटाखे
छुड़ाने, घर को सजाने-स¡वारने व महालक्ष्मी की पूजन का। पूजन के बाद एक-दूसरे से मिलने, मिठाई
खाने-खिलाने का आदान-प्रदान चलता है। बिना लक्ष्मी के सभी कार्य सम्पन्न नहीं होते हैं।
दीपावली के बाद उस गोवर्धनकारी 16 कलाओं से युक्त भगवान कृष्ण की व गोवर्धन पर्वत की पूजा
करने का भी विधान है। 36 प्रकार के व्यंजन बनाकर भोग लगाया जाता है। उसका अपना ही आनन्द है।
मनुष्य जीवन में व्रतों, पर्वों व त्यौहारों को मनाने की परम्परा अगर न हो, तो जीवन नीरस हो जायेगा।
उसमें जीने की उमंग फीकी पड़ जायेगी। आज के इस मशीनी युग में जहा¡ मनुष्य रात-दिन काम के बोझ
तले दबता जा रहा है अगर उसके जीवन में यह छोटे-छोटे सुखद क्षण भी न आयें तो वह किस प्रकार
अपने आपको खुश रख पायेगा। आमोद-प्रमोद तो चाहिए ही।
त्यौहारों, जन्म-तिथियों, विवाह, मुण्डन को मनाने में संगीत व नृत्य का भी अपना एक अद्भुत रोल
है। संगीत से मन प्रफुल्लत तो होता ही है, शरीर में उत्साह और उमंग का अद्भुत संचार भी होता है।
स्वर माधुरी में इतनी शक्ति होती है कि बीमार व्यक्ति भी अपने आपको स्वस्थ समझने लगता है। फसलों
के पकने पर महिलायें, चाय बागान से चाय तोड़ती हुई सुगीत के साथ झूम-झूम कर अपने श्रम को भी
कम करती हैं। साथ ही वह दृश्य देखकर औरों का मन भी मुग्ध हो जाता है।
यह सब त्यौहार, पर्व व व्रत तो हमारी परम्पराओं, संस्कृति से जुड़े ही हैं पर मैं यहा¡ नयी पीढ़ी द्वारा
जो त्यौहार मनाये जा रहे हैं उनका भी वर्णन करना चाहू¡गी जो पाश्चात्य सभ्यता की देन हैं। बर्थ डे,
वैलेनटाइन डे, मैरिज एनीवर्सरी, फादर डे, मदर डे आदि। पर हम भी संकुचित विचारधारा के नहीं हैं। यह
भी मनायें। अपनी सभ्यता, संस्कृति, पर्वों, त्यौहारों को, व्रतों को अपने जीवन में अवश्य जगह दें। जिसने
अपनी सभ्यता व संस्कृति को भुला दिया वह अपनी पहचान, अपनी जाति की पहचान खो देगा। खुशी
हमें जिन चीज़ों से प्राप्त हो, दोनों हाथों से बटोरें।
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